हरिद्वार। संसद की गरिमा एवं संवैधानिक पदों के सम्मान को लेकर संत समाज ने चिंता व्यक्त करते हुए सदन में मर्यादित एवं शालीन भाषा के प्रयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। हरिद्वार में आयोजित प्रेस वार्ता में श्री जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महासचिव श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने कहा कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का पद अत्यंत सम्माननीय है और संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। ऐसे में सदन के भीतर व्यक्त किए जाने वाले प्रत्येक शब्द में मर्यादा, संयम और गरिमा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने कहा कि सांसद पप्पू यादव द्वारा सदन में प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय गृहमंत्री के संबंध में की गई टिप्पणी मर्यादा के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है, लेकिन अभिव्यक्ति की भाषा सदैव शालीन एवं सम्मानजनक होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी अमर्यादित टिप्पणी करने वालों को संत समाज कभी माफ नहीं करेगा।
उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा शिष्टाचार, संस्कार और सम्मान की शिक्षा देती है। जनप्रतिनिधि समाज के प्रतिनिधि होते हैं, इसलिए उनसे भी सार्वजनिक जीवन में संयमित और मर्यादित आचरण की अपेक्षा की जाती है। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन संवैधानिक पदों की गरिमा और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।
इस विषय पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्र पुरी जी महाराज ने कहा कि संसद लोकतंत्र का पवित्र मंदिर है, जहां राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर गंभीर और गरिमापूर्ण चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों से आग्रह किया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों का सम्मान बनाए रखें तथा ऐसी भाषा के प्रयोग से बचें, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा प्रभावित हो।
महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद महाराज ने कहा कि वाणी मनुष्य के संस्कारों का दर्पण होती है। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन उसका स्वरूप सदैव मर्यादित, संयमित और राष्ट्रहित से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने समाज में संवाद, सद्भाव और पारस्परिक सम्मान की संस्कृति को मजबूत करने का आह्वान किया।
प्रेस वार्ता के दौरान श्री जूना अखाड़े के महामंत्री श्री कमलपुरी जी महाराज, महंत आकाश गिरी महाराज सहित बड़ी संख्या में संत-महापुरुष एवं सनातन परंपरा के अनुयायी उपस्थित रहे। संत समाज ने एक स्वर में लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा, संवैधानिक पदों के सम्मान तथा सार्वजनिक जीवन में मर्यादित भाषा के प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
संत समाज ने देशवासियों से भी अपील की कि वैचारिक मतभेद चाहे कितने भी हों, संवाद की मर्यादा और भारतीय संस्कृति के मूल्यों का सदैव पालन किया जाए। संतों ने कहा कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग परस्पर सम्मान, संयम और सकारात्मक संवाद से ही प्रशस्त होता है।

