श्री राम कृपा धाम आश्रम में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन गूंजा भक्ति और ज्ञान का संदेश

(रितिक कुमार)

हरिद्वार। भूपतवाला स्थित श्री राम कृपा धाम आश्रम में गौ सेवार्थ एवं पितृमोक्षार्थ आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना रहा। कथा व्यास साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने श्रद्धालुओं को श्रीमद्भागवत के विभिन्न दिव्य प्रसंगों का श्रवण कराया। कथा के दौरान भजन-कीर्तन, जयघोष और भगवान श्रीकृष्ण के नामस्मरण से पूरा आश्रम परिसर भक्तिमय नजर आया।

कथा के दूसरे दिन राजा परीक्षित के जन्म, श्री शुकदेव जी के आगमन और भीष्म पितामह की स्तुति के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया। साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने कहा कि राजा परीक्षित का जन्म भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा से हुआ था। महाभारत युद्ध के पश्चात जब अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे बालक को ब्रह्मास्त्र से नष्ट करने का प्रयास किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने दिव्य स्वरूप धारण कर गर्भस्थ बालक की रक्षा की।

उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित के जीवन से मनुष्य को यह सीख मिलती है कि जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु की वास्तविकता को समझते हुए अपने जीवन को भगवान की भक्ति, सत्संग और सद्कर्मों में लगाना चाहिए। जब राजा परीक्षित को अपने जीवन के अंतिम सात दिनों का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर गंगा तट पर श्रीहरि की कथा सुनने का संकल्प लिया।

इसके पश्चात श्री शुकदेव जी के आगमन का प्रसंग सुनाया गया। साध्वी जी ने बताया कि शुकदेव जी का जीवन त्याग, वैराग्य और ब्रह्मज्ञान का प्रतीक है। राजा परीक्षित ने उनसे मृत्यु के निकट पहुंच चुके मनुष्य के कर्तव्य और भगवान की प्राप्ति के मार्ग के संबंध में प्रश्न किया, जिसके उत्तर में शुकदेव जी ने उन्हें श्रीमद्भागवत महापुराण का दिव्य ज्ञान प्रदान किया।

कथा में भीष्म पितामह की स्तुति का प्रसंग भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहा। महाभारत युद्ध के बाद बाणों की शय्या पर स्थित भीष्म पितामह द्वारा भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान एवं स्तुति किए जाने का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। साध्वी जी ने कहा कि यह प्रसंग मनुष्य को जीवन की अंतिम अवस्था तक भगवान के प्रति श्रद्धा, भक्ति और समर्पण बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है। इसके श्रवण से मनुष्य के भीतर भक्ति, वैराग्य और सद्विचारों का संचार होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा के संदेश को केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए उसे अपने जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।

कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से कथा का श्रवण किया। समापन पर भगवान की आरती की गई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। इस दौरान आश्रम परिसर श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंज उठा। गौसेवा, धर्म, सेवा और पितृमोक्ष के उद्देश्य से आयोजित इस धार्मिक आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।

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